हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , आयतुल्लाह अब्बास काबी ने हौज़ा न्यूज़ से बातचीत में कहा कि इस्लामी क्रांति, वर्तमान दौर में अहलेबैत (अ.स.) की शिक्षाओं की रौशनी में मोहम्मदी (स.अ.व.) सीरत की व्यावहारिक नवीनीकरण है।
उन्होंने कहा कि यह क्रांति वैश्विक और प्राकृतिक सभ्यता की क्षमता रखती है और इसका संबोधन वह इंसान है जो हिदायत स्वीकार करने की क्षमता रखता है।
नई इस्लामी संस्कृति का निर्माण
आयतुल्लाह काबी ने आगे कहा कि नई इस्लामी संस्कृति का निर्माण ईश्वरीय नेतृत्व के मार्गदर्शन, इज्तिहाद ज़माने की ज़रूरतों की सही पहचान और आधुनिक मानवीय समस्याओं के समाधान के ज़रिए संभव होता है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि यह क्रांति, ग़दीर की बुनियाद, आशूरा की रूह और इंतेज़ार की संस्कृति से प्रभावित होकर, तौहीद, इंसाफ और मानवीय सम्मान की बुनियाद पर वैश्विक व्यवस्था में बुनियादी परिवर्तन का माध्यम बनी है।
मेंहदवीयत और अच्छे समाज का निर्माण
मजलिस-ए-ख़बरगान-ए-रहबरी के सदस्य ने कहा कि महदवी शिक्षाओं के मुताबिक, ईश्वरीय नेतृत्व मानव समाज की राहनुमाई करता है और ईमान, तौहीद और अच्छे कर्म की बुनियाद पर ऐसे समाज का निर्माण करता है जो तानाशाही और साम्राज्यवाद के खिलाफ़ संघर्ष और मानवीय पहचान की बहाली पर कायम हो।
इस्लामी क्रांति, वैश्विक मेंहदवी क्रांति की शुरुआत
आयतुल्लाह काबी ने कहा कि इस्लामी क्रांति, हज़रत बाक़ीयतुल्लाह अल-आज़म (अ.ज.) की वैश्विक क्रांति की तैयारी है और यह क्रांति 'विलायत-ए-फ़क़ीह' को इमाम-ए-ज़माना (अ.ज.) की नियाबत-ए-आम्मा के तौर पर मानते हुए बनी है।
उन्होंने इमामत के दो प्रकार बताते हुए कहा,एक 'इमामत-बिल-असालाह' है, जो इमाम-ए-ज़माना (अ.ज.) के लिए ख़ास है, और दूसरी 'इमामत-बिन-नियाबत' है, जो वली-ए-फ़क़ीह के ज़रिए होती है।
उन्होंने आगे कहा कि इस्लामी क्रांति, शुद्ध इस्लामी शिक्षाओं, इज्तिहाद, ज़माने की जानकारी, वली-ए-फ़क़ीह की राहनुमाई, हौज़ा और यूनिवर्सिटी के विद्वानों के प्रयासों और जनता की भागीदारी के नतीजे में कामयाब हुई।
सब्र और प्रतिरोध का महत्व,आयतुल्लाह काबी ने कहा कि इस्लामी क्रांति ने सब्र, स्थिरता और साजिशों के मुकाबले प्रतिरोध के ज़रिए कामयाबी हासिल की और मुश्किल चरणों से गुज़री।उन्होंने कहा कि आज भी यह क्रांति जिहाद, प्रतिरोध और जनता के समर्थन की बदौलत तरक़्क़ी के रास्ते पर है।
जामिया मदर्रिसीन के उपाध्यक्ष ने कहा कि इस्लामी क्रांति अपने लक्ष्यों को महदवी शिक्षाओं की बुनियाद पर आगे बढ़ा रही है और यह एक बड़ी नेमत है जिसने वैश्विक रुकावटें तोड़ कर मिल्लत-ए-ईरान (ईरानी राष्ट्र) का संदेश दुनिया तक पहुंचाया।
आयतुल्लाह काबी ने कहा कि क्रांति से पहले दुनिया पूर्वी और पश्चिमी खेमे में बंटी हुई थी। आज भी दुनिया दो खेमों में बंटी है: एक, बिगड़ते हुए अहंकारी व्यवस्था जो लिबरल लोकतंत्र पर कायम है, और दूसरा, वह खेमा जो इस्लामी क्रांति के विचारों की बुनियाद पर तेज़ी से आगे बढ़ रहा है। यह दूसरा खेमा, मोहम्मद और आले-मोहम्मद (स.अ.व.) की 'विलायत' का वैश्विक खैमा है।
आयतुल्लाह काबी ने अंत में कहा कि हम हज़रत बाक़ीयतुल्लाह अल-आज़म (अ.ज.) के ज़ुहूर और विलायत-ए-कामिला के ज़ुहूर के मुंतज़िर हैं।
उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि इस्लामी क्रांति, उस बड़े ज़ुहूर की तैयारी और वैश्विक इस्लामी लक्ष्यों की पूर्ति का माध्यम है।
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